एकांत में जब कभी देश के विषय में सोचता हूँ तो काफी परेशान हो जाता हूँ जब हम सरकार के आंकडों से इतर देश देखते हैं तो ज़मीन असमान का फर्क नज़र आता है एक तरफ देश विकास की और अग्रसर है तो दूसरी तरफ की हकीक़त कुछ और ही है तेज़ रफ्तार अर्थयुग है तो यहीं भूक और कर्जे से मरने वाले किसान भी हैं कोई छमाही खरबों में कमाता है तो किसी को साल में ३६५ दिन भोजन मिल जाय तो यही बहोत है एक तरफ सैकडों रुपये का फास्ट फ़ूड खाने वाले हैं तो दूसरी तरफ कुपोसड का शिकार बच्चों से लेकर बूढे तक हैं. एक तरफ उच्च शिक्षा के नाम पर लाखों की डिग्रियां खरीदने वाले हैं तो दूसरी तरफ २० रुपये महीना फीस भी नहीं हो पाती की बच्चों को पढाया जा सके एक तरफ शिक्षा का बाजारीकरण है तो दूसरी तरफ सरकारी शिक्षा के नाम पर कालाबाजारी है एक तरफ आरक्षण है नीलाम होती नौकरियां है तो दूसरी तरफ बेरोजगारों की बढती फौज है एक तरफ शोषण है अत्याचार है घूसखोरी है भ्रष्टाचार है तो दूसरी तरफ मरते हुए ईमानदार मेहनतकश हैं आत्महत्या को मजबूर किसान और भुकमरी की कगार पर इनके परिवार और लाचार जनता एक तरफ देश का लोकतंत्र है तो दूसरी तरफ उसका चीरहरण करने वाले राजनितिक दल हैं एक तरफ देश का संविधान है तो दूसरी तरफ उसकी जडों में बैठे ज़हरीले सांप हैं एक तरफ देश का आपसी विशवास है भाईचारा है तो दूसरी तरफ देश के अन्दर ही उसको तार तार करने वाले सांप्रदायिक समूह हैं एक तरफ देश के लिए मरते हुए जवान हैं तो दूसरी तरफ देश के अन्दर लड़ते हुए हिन्दू मुस्लमान हैं एक तरफ बापू का गांधीवाद है तो दूसरी तरफ माओ का माओवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद एक तरफ भारतीयता है तो दूसरी तरफ मराठी, बंगाली, तमिल, गुजरती, असमी,और न जाने कौन कौन हैं.......................देश तो आगे बढ रहा है लेकिन किस ओर समझना बहोत मुश्किल है .................
आपका हमवतन भाई ...गुफरान....अवध पीपुल्स फोरम..फैजाबाद...
Wednesday, May 27, 2009
Friday, May 1, 2009
भारत को खंड खंड करते यहाँ के वासी..................,
जनाब अगर आप किसी भी मुल्क में जाओ और वहां के बाशिंदों से सवाल करो आप कहाँ से हैं तो उसका जवाब होगा .....अमेरिका वाला बोलेगा मैं अमेरिकन हूँ अफ्रीकी बोलेगा अफ्रीकन हूँ अरब बोलेगा अरबी हूँ नेपाली बोलेगा नेपाली हूँ ,,,,,,लेकिन हम जब अपने देश में सवाल करते हैं तो यहाँ हिन्दुस्तानी छोड़ कर सब मिल जाते हैं कोई पंजाबी होता है, कोई मराठी होता है, कोई बंगाली होता है, तो कोई तमिल लेकिन कोई भी हिन्दुस्तानी नहीं होता है आखिर गलती कहाँ की गयी की हम क्षेत्रवाद को देश से ज्यादा महत्व देने लगे क्या किसी ने कभी इस विषय में सोचा या किसी ने इसके लिए कोई ठोस पहेल की शायद ये हिन्दोस्तान का दुर्भाग्य है की आज़ादी की लडाई में जब हमारे हिन्दुस्तानी भाई अपने मुल्क के लिए जाने दे रहे थे तो उनके लिए क्षेत्रवाद नहीं अपना देश प्यारा था यहाँ हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई बोलने वाला कोई नहीं था सब भारतीय थे लेकिन आज़ादी मिलने के बाद यहाँ शुरू हुवा लोकतंत्र की खरीद फरोक्त का खेल पहले एक नारा आया हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई आपस में हैं भाई भाई .....यहीं से शुरू हुवा इन राजनितिक दलालों का खेल इन्होने सबसे पहले ऐसे सन्देश बनाये की लोगों को ये एहसास हो की भारत अब आजाद हो चूका है और यहाँ अलग अलग धर्मो के मानने वाले रहते हैं जिनका रहेन सहेन सब अलग हैं और ये एक दुसरे के साथ नहीं रह सकते हम इनको साथ रहना सिखायेंगे और फिर हर धर्म का दलाल अपने आप को उस कौम का नेता बताने लगा और फिर शुरू हुवा अधिकार दिलाने के नाम पर आपसी भाईचारे को बीच बाज़ार नंगा करने का खेल यहाँ तक तो फिर भी ठीक था लेकिन जब राजनीति ने व्यवसाय का रूप लेना शुरू किया तो इन दलालों को अपनी कौम को बेचने में मोती कमी होने लगी और फिर शुरू हुवे सांप्रदायिक दंगे आज तक इन दंगों में इन दलालों का कोई भी करीबी नहीं मारा गया न ही इनकी संपत्ति का कोई नुकास्सन ही हुवा मारा कौन गया बर्बाद कौन हुवा बताने की ज़रूरत नहीं और आज देखिये हम किस जगह खड़े हैं हम दावे करते हैं की हम जल्द ही विकसित राष्ट्र बन जायेंगे लेकिन कैसे कोई बताने को तैयार नहीं हमारे देश में लोग क्षेत्रवाद की बातें करते हैं अपने राज्य से बाहरी (दुसरे राज्य) से आये हुवे लोगों को मार मार कर भागाते हैं क्यूँ क्या वो हिन्दुस्तानी हैं या फिर वो राज्य अपने आप को एक अलग देश साबित करने पर तुला है! वास्तव में ये एक ऐसी समस्या है जिसका वक़्त रहते इलाज नहीं किया गया तो शायद अखंड भारत कहने वाले लोग ही भारत को खंड खंड करने में सबसे आगे होंगे और बदनाम होंगे कुछ खास तबके के लोग .....अभी हमें लगता है की देश आगे जा रहा है लेकिन कहाँ सही जवाब कोई देना नहीं चाहता हमारे किसान खुदकुशी कर रहे हैं, हमारे नवजवान नक्सली आतंकवादी बन रहे हैं , सरकारी तंत्र रिश्वत खोरों और भरष्ट लोगों के आगे नतमस्तक है , और सर्कार चलाने वाले अपने ही देशवासिओं के लहू से अपने धन के बगीचों को सींच रहे हैं तो साथियों हम कहाँ विकसित राष्ट्र बनने के रस्ते पर हैं...?
Wednesday, March 25, 2009
शहादत दिवस और देशवासी......
साथियों एक शहादत दिवस और निकल गया मै बात कर रहा हूँ अपने शहीदे आज़म सरदार भगत सिंह की लेकिन हमारे देश की मीडिया को इतनी फुर्सत कहाँ की वो इन शहीदों को श्रधांजलि दे सके वो तो टाटा का सपना छापने में लगे रहे और जो दिखाने का काम करते हैं वो दिखाते रहे और इनको शहीद दिवस से क्या लेना देना जब जनता ही अपने शहीदों याद नहीं करना चाहती तो भला प्रेस क्यों अपनी जेब इनकी वजह से हलकी होने दे जितना पैसा टाटा की नैनो दे रही है उसका प्रचार करने में उतना ये शहीद कहाँ से देंगे और इनको मरने के बाद खबर बनने की क्या ज़रूरत है वैसे भी जितना सम्मान भ्रष्ट नेता समाजसेवियों मिलना चाहिए वो तो उनको मिल ही रहा है और देश के लूट घसोट में जितना सहयोग ये बिरादरी करती है उतना कौन करता है इस लिए शहीदों की खबर बना कर क्या इनसे पंगा लेना है और अब जब बापू को भी वरुण जैसे ऐरे गैरे गरिया सकते हैं और मीडिया उनको छाप और दिखा कर माल बना रही है तो इन देश भक्तों को को दिखा कर क्यों मज़ा किरकिरा किया जाये वैसे भी अंधी गूंगी जनता को मसाला मिलना चाहिए चाय और पान की दुकानों पर खड़े हो कर चर्चा करने के लिए उनको इससे क्या मतलब की अतीत में उनके लिए कितनो ने गोलियां खाई कितने फँसी पर झूल गए कितने जिंदा दफ़न हो गए अब देशवासी नेताओं में सबसे भ्रष्ट कौन है कौन देश बेच रहा है ऐसे लोगों को पसंद करने लगे हैं जिनको मीडिया फायर ब्रांड कहता है और यही सेल देश को नफरत की आग में झोक रहे हैं तो दोस्तों कहाँ हमें शहीद दिवस की याद होगी........................
आपका हमवतन भाई ...गुफरान.........अवध पीपुल्स फोरम फैजाबाद.
आपका हमवतन भाई ...गुफरान.........अवध पीपुल्स फोरम फैजाबाद.
Saturday, March 21, 2009
लोकतंत्र के पशुबज़ार में स्वागत है.......
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लगने वाले पशु बाज़ार में आपका स्वागत है, यही एक ऐसा लोक तंत्र है जहाँ जनता पशुवों की मानसिकता की है जिनके भाग्य का फैसला हमारे देश के बड़े उद्योगपति करते हैं और ये पशुबज़ार के खरीदार राजनितिक दल इन्ही उद्योगपतियों से चंदा लेकर जनता के वोट की बोली लगाते हैं और जनता भी पशुवों की भांति उनसे भी कम दामों में बिकती रहती है और फिर उन्ही खरीदारों के हांथो जुतियाई भी जाति है पहले ये अपने पशु होने का सबूत देते हैं जब वोट करते हैं तो देश,विकास,बेरोजगारी,शिक्षा,स्वास्थ जो की इनका अधिकार है के विषय में नहीं सोचते तब जाति, धर्म और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों पर ये वोट करते हैं लेकिन जैसे ही सरकार बनती है और जनता के डंडा करना शुरू करती है इनकी इंसानियत जाग जाति है और ये घडियाली आंसू बहाना शुरू कर देते हैं और एक दुसरे को कोसना शुरू कर देते हैं और शुरू होता है आन्दोलन और धरनों का दौर इसमें ये किसी और का नहीं अपना खुद का नुकसान करते रहते हैं लेकिन इससे सबक न सीखते हुए फिर जब चुनाव निकट आने लगता है ये देश विकास समाज सब भुला कर अपने पशुत्व पर लौट जाते हैं और जब इनके सामने कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव में ताल ठोकता है जिसके पास सिर्फ कर्म है सत्यता है कर्मठता है तो यही लोग उसे मुर्ख समझ कर उस पर हंसते उसकी जमानत जप्त करते हैं और गुंडों के भ्रष्ताचारिओं के पिछलग्गू बने उनकी जय जय कार करने में ही अपना सर गर्व से ऊँचा रखते हैं तो कुकुरमुत्तों की भांति क्यों ना इस देश में राजनितिक दल हों। जब जाति,धर्म,क्षेत्र के नाम पर जनता वोट करेगी तो पार्टियाँ भी इसी आधार पर बनेगी और पशुबज़ार में खरीदार भी बढ़ेंगे लेकिन इसके बदले जनता को क्या मिलता है ये सवाल ज़रूर एक बेहतर मुद्दा हो सकता है..........,
आपका हमवतन भाई ....गुफरान.....अवध पीपुल्स फॉरम फैजाबाद.
आपका हमवतन भाई ....गुफरान.....अवध पीपुल्स फॉरम फैजाबाद.
Sunday, March 8, 2009
नारी दिवस पर विशेष...........?
औरत देवी है माँ है बहेन है बेटी है पत्नी है और भी न जाने क्या क्या रूप हैं लेकिन हमारे समाज में क्या ये सुरक्षित हैं हम क्यों नहीं इनको बराबरी का दर्जा देते हैं.? अत्याचार करते हैं, हवस का शिकार बनाते हैं, खरीद फरोक्त तक करतें हैं.? इनकी और कहने को ये हमारे धर्म में देवी का स्थान रखतीं है या यूँ कहें की एक माँ (औरत) के क़दमों के नीचे जन्नत है ये भी ईश्वरीय वाणी है फिर क्यों ये पैदा होते ही मार दी जाती हैं.? क्यों ये जलाई जाती हैं.? शिक्षा से महरूम रहती हैं.? क्यों इनको बराबरी का दर्जा देने के लिए हम आना कानी करते हैं.? इसके पीछे क्या है..? ऐसे बहोत से सवाल हजारों लाखों के दिलो में उठते होंगे लेकिन जवाब शायद किसी के पास नहीं या यूँ कहें की जवाब कभी खोजने की कोशिश ही नहीं की आखिर करते भी तो कैसे कई पीदियों से जिस परंपरा का निर्वहन हम करते आ रहे हैं उसमे इन सवालों के लिए ही गुंजाईश नहीं थी तो जवाब का सवाल ही नहीं पैदा होता लेकिन अब वक़्त के साथ इन्होने चलना सीख लिया है. अगर हम कुछ अपवाद छोड़ दें तो इतिहास गवाह है सैकडों सालों से जो परंपरा चली आ रही थी उसे खुद औरतों ने ही अपने बूते तोडा है लेकिन अब हम सभी को इनके अधिकारों की अनदेखी बंद करनी होगी और औरतों को समाज में अपने से बेहतर दर्जा देना होगा आखिर यही देवी है यही माँ है यही बहन है यही अर्धांग्नी है.और जन्नत का रास्ता इन्ही (माँ) के पैरों के नीचे है.लिखना तो बहोत कुछ था लेकिन समय कम ही इस लिए यहीं बंद कर रहा हूँ इंशा अल्लाह बाद में मुकम्मल करूँगा.आपका हमवतन भाई गुफरान........अवध पीपुल्स फोरम फैजाबाद
Saturday, January 24, 2009
अरे भाई ये सुभाष चंद्र बोस कौन है...........!
अरे भाई ये सुभाष चंद्र बोस कौन है कुछ सुना सुना नाम लग रहा है! हाँ याद आया बचपन में गुरु जी ने हम लोगों की किताब में कोई कहानी पढाई थी कोई था देश के लिए बहोत बड़ी कोई सेना बनाने वाला क्या नाम था सेना का ..........हाँ 'आजाद हिंद फौज' आज अख़बारों के माध्यम से पता चला की उनकी जन्मशती है वो भी किसी भी राष्ट्रीय अखबार के मुख्या पृष्ठ पर नही बल्कि बीच के पन्ने पर छोटा सा दिया हुवा था ! अब ये कोई राज नेता तो हैं नही की बहेनजी , भाई साहब , चाचा फलाने , काका फलाने, अम्मा , बाबु जी , साहब और भई न जाने क्या क्या नाम होते हैं जब इन नेताओं का जन्मदिन होता है और पुरा प्रदेश , देश इनकी जय जय कार करते हैं और हमारे खबरिया माध्यम पुरा दिन टी.वी.पर इनको दिखाते रहते हैं और अखबार उनकी जय जय कार से पटे पड़े रहते हैं !ऐसे में हमको ऐसे आदमी को याद करने से क्या मिलेगा जिसको हमारी अपनी सरकार ने कभी देश भक्त मानने से इनकार कर दिया था और पता नही कहाँ उन्होंने अपनी जीवन की अन्तिम सांसे ली !
कुछ लोग कहते हैं की फैजाबाद में गुमनामी बाबा की समाधी उन्ही की है सो हम भी आज के दिन कुछ पलों के लिए वहां चहेल कदमी कर आए और लगे हाथ कुछ बात चीत भी कर ली गुमनामी बाबा से लेकिन बाबा जी ने मुझे कोई जवाब नही दिया हाँ वापसी पर अलबत उस समाधी से आवाज़ आई की अबे नालायक तू क्यों मेरी चिंता में घुला जा रहा है जब मेरे देश ने ही मुझे भुला दिया तो तू तो अभी ठीक से देशवासी भी नही हो पाया है ! जा पहले इन तथा कथित देश भक्तों से नेताओं से देशवासी होने का पहचान पत्र ले कर आ फ़िर मुझसे बात करना और हाँ रात के अंधेरे में ही आना नही तो तेरा भी सौदा कर दिया जाएगा और फ़िर तुझे भी मरने से पहले यूँ ही गुमनामी की ज़िन्दगी बितानी होगी और मरने के बाद भी सरकार ही घोषित करेगी की तू है कौन और वो भी १००-२०० सालों की जाँच करने के बाद.........,,ये वो नेता जी थे जिनको शायद हम सभी भुला चुके हैं और चिरकुट सरकारी मदद लेने वाले क्रांतिकारियों से भी गया गुजरा समझते हैं.....................,,,,,,,,,,,,
कुछ लोग कहते हैं की फैजाबाद में गुमनामी बाबा की समाधी उन्ही की है सो हम भी आज के दिन कुछ पलों के लिए वहां चहेल कदमी कर आए और लगे हाथ कुछ बात चीत भी कर ली गुमनामी बाबा से लेकिन बाबा जी ने मुझे कोई जवाब नही दिया हाँ वापसी पर अलबत उस समाधी से आवाज़ आई की अबे नालायक तू क्यों मेरी चिंता में घुला जा रहा है जब मेरे देश ने ही मुझे भुला दिया तो तू तो अभी ठीक से देशवासी भी नही हो पाया है ! जा पहले इन तथा कथित देश भक्तों से नेताओं से देशवासी होने का पहचान पत्र ले कर आ फ़िर मुझसे बात करना और हाँ रात के अंधेरे में ही आना नही तो तेरा भी सौदा कर दिया जाएगा और फ़िर तुझे भी मरने से पहले यूँ ही गुमनामी की ज़िन्दगी बितानी होगी और मरने के बाद भी सरकार ही घोषित करेगी की तू है कौन और वो भी १००-२०० सालों की जाँच करने के बाद.........,,ये वो नेता जी थे जिनको शायद हम सभी भुला चुके हैं और चिरकुट सरकारी मदद लेने वाले क्रांतिकारियों से भी गया गुजरा समझते हैं.....................,,,,,,,,,,,,
Saturday, December 27, 2008
[फिर शहीद हुवे]29/11/08
अनाथ बच्चे बिलखते
माँ बाप खाली दामन तकते,
फिर कोई फूल चमन से
फिर चमन किसी फूल से
आज महरूम हो गया है ,
फिर पड़ी दरारें आपस में
फिर किसी ने उगला ज़हर है,
फिर खेली गयी होली खून की
फिर शहीद हुवे
भगत चंद्रशेखर अशफाक ,
रोको इन दह्शद-गर्दों को
ये देश की अंधी राजनीति के
पेट से पैदा कुछ कीड़े हैं,
देश बेचने वालों के
ये अन्न दाता हैं
जागो भारत की अब
हम टूटने की कगार पर हैं ,
एक क्रांति और पुकार रही है
सुनो इस पुकार को
आज़ाद करा लो देश
आओ एक बार फिर से
हम सिर्फ क्रांतिकारी बने
एक बार फिर से हम
देश में बदलाव के लिए संघर्ष करें......,
apka हमवतन भाई गुफरान(AWADH PEPULS FORUM FAIZABAD)
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