Friday, October 10, 2008

क्या है आतंकवाद...........?

पश्चिम द्वारा इजाद किये आतंकवाद (terrorism)नामक शब्द को अब सीधे तौर पर इस्लाम का पर्याय माना जाने लगा है.जबकि मुस्लिम बुद्धिजीविओं से लेकर आम मुस्लिमो तक का मानना है कि तथाकथित आतंकवाद का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं आतंकवादी कार्यवाई शरियत के खिलाफ,नाजायज़ और मजम्मत के लायक है.इसलिए इन गतिविधियों में लिप्त लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए ऐसी कार्यवाइयों के वजूहात चाहे सही और माकूल ही क्यूँ न हों हिंसा और खून-खराबे की इजाज़त बहर हाल किसी को नहीं दी जा सकती क्योकि यह भी आतंकवाद है.मोटे तौर पर इससे यही समझा जा सकता है कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं है और न ही वह इसकी इजाज़त देता है.हालाँकि इस पूरी बहस में सबसे रोचक बात यह है कि जिस बुनियाद पर पूरी ईमारत खड़ी की गयी है.अभी तक यही तय नहीं हो पाया है कि वह आखिर क्या है....?आतंकवाद कि परिभाषा को लेकर जितने मुह उतनी बातें लेकिन मोटे तौर पर हर वह कार्यवाई आतंकवाद है जिसमे हिंसा (violence)पाई जाती हो,जिसमे खास लोगों के साथ आम लोग(civilian) या गैर जंगजू लोग(non.combatant)भी मारे जाएँ या घायल हों या उनकी धनसम्पदा को नुकसान पहुँचता हो.और ऐसी हिंसात्मक कार्यवाई के लिए किसी कानूनी इदारे से इजाज़त न मिली हुई हो.
लेकिन सवाल ये उठता है कि ये लागू किस पर होता है अगर कुछ लोगो के गलत होने से पुरे संप्रदाय को निशाना बनाना ठीक है तो दुसरे संप्रदाय के कुछ संगठनों द्वारा समय समय पर देश के विभिन्न कोनो में एक धर्म या जाति विशेष का किया गया जनसंहार किस श्रेडी में आता है क्यूँ उसको क्रिया की प्रतिक्रिया बताया जाता है....?(जैसा गुजरात दंगों के विषय में कहा जाता है) उडीसा में विहिप नेता स्वामी लक्ष्मदानंद सरस्वती और चार अन्य लोगों की हत्या नक्सलियों ने कर दी थी.और ये बात सभी को मालूम थी पुलिस पहले ही दिन से ये बोल रही थी लेकिन बी.जे.पी. बजरंगदल विश्व हिन्दू परिषद् जैसे 'कथित देशभक्त' संगठनों ने उडीसा में हिंसा का नंगा नाच शुरू कर दिया.....हत्या, लूट, बलात्कार,और न जाने क्या क्या....!
इन तथाकथित देशभक्त संगठनों के नेता बराबर सरस्वती जी के हत्त्यारों की गिरफ्तारी की मांग करते रहे लेकिन हिंसा को ये कहकर समर्थन देते रहे की इस घटना को ईसाईयों ने अंजाम दिया है और हमारे कार्यकर्ता बदला ले रहे हैं.लेकिन अभी तक जगह जगह चीखते चिल्लाते हिंसा को समर्थन देते इन नेताओं की बोलती बंद है.वजह ये है की उडीसा का सबसे वांछित नक्सली नेता 'सब्यसाची पंडा उर्फ़ सुनील' ने एक निजी न्यूज़ चैनल के द्वारा इस हत्या की जिम्मेदारी ली है.वजह ये बताई की सरस्वती जी वहां सामाजिक अव्यवस्था फैला रहे थे वजह चाहे जो भी हो लेकिन जो हुवा ठीक नहीं हुवा लेकिन इसका ये मतलब नहीं की आप किसी को जिम्मेदार मान कर उस पूरी जाति या धर्म को निशाना बनायें क्या ये आतंकवाद नहीं है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि पंडा उर्फ़ सुनील किस जाति या धर्म से ताल्लुक रखता है और कंधमाल में जो सैकडों इसाई मारे गए और इन तथाकथित देशभक्तों ने औरतों लड़कियों का बलात्कार लिया उनको जिन्दा जलाया क्या वो सब देश-द्रोही थे अब जबकि हत्यारा खुद सामने है तो क्यूँ नहीं उसको पकड़कर सजा देते क्यूँ बेक़सूर देशवासियों का खून बहाया जा रहा है उनकी बहेन बेटियों कि इज्ज़त को तार तर किया जा रहा है क्यों.....?और इन तथाकथित देशभक्तों को याद दिलाना होगा कि चर्चित संत ज्ञानेश्वर हत्या कांड किसने किया किसने करवाया वहां क्यों हिंसा नहीं हुई क्या वहां देश भक्ति सोई थी या डर लग रहा था वहां किसी ने आवाज़ नहीं उठी कोई हिंसा नहीं हुई इस तरह का दोहरा मापदंड क्यों.....?
क्या सिर्फ इसी लिए देश भक्ति जैसे शब्द को गन्दा किया जा रहा है और खुद का हित साधा जा रहा है वैसे हित साधने से याद आया 'अडवानी जी' की पाकिस्तान यात्रा की थोडी चर्चा हो जाये वहां अडवानी जी ने जिन्ना को सेकुलर क्या कह दिया अपने देश अपनी ही पार्टी जिसको हाथ पकड़ कर चलना सिखया और वो संगठन जो उनके ही रहमो करम पर पल रहे हैं ने उनको देशद्रोही तक बना दिया संघ ने तो उनका इतना विरोध किया की बेचारे रो पड़े लेकिन संघ ने ऐसा क्यूँ किया ये समझ से बाहर है शायद ही संघ का कोई बड़ा नेता ये न जानता हो की उनके नेता डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी १९३५ में व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थों या अवसरवादिता का परिचय देते हुवे मुस्लिम लीग के समर्थन से ही वित्तमंत्री बन बैठे थे डाक्टर मुखर्जी आज भी देशभक्त कहे जाते हैं तो अडवानी जी को माफ़ी मांगने पर मजबूर होना पड़ा क्यों.....?इसी के साथ थोडी चर्चा कर्नाटक की हो जाये वहां धर्मंतारद को मुद्दा बना कर देशभक्त बजरंगियों ने तबाही मचाई हुई है जाँच हुई कहीं भी धर्मान्तरण की पुष्टि नहीं हुई १७ बजरंगी जेल की हवा खा रहे हैं इन सबके बीच कानपूर में एक हादसा हुवा बम बनाते हुवे धमाके में दो लोग मर गए जाँच में पता चले की वो भी तथाकथित देशभक्त संगठन से जुड़े थे पर आज तक ये पता नहीं लग पाया की वो बम क्यों बना रहे थे.और उनका इरादा क्या था.इसी बीच रास्ट्रीय अल्पसंखक आयोग ने बजरंगदल पर प्रतिबन्ध की शिफारिश करके गलत किया..?
गो-हत्या के मुद्दे पर यही कहूँगा कि चमड़े के कारोबार पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये तो गो-हत्या अपने आप बंद हो जायेगी अब सवाल ये उठता है कि देश में चमड़े के बड़े कारोबारी किस धर्म से हैं किसी से ढाका छुपा नहीं है लेकिन उनके खिलाफ बोलने कि हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है क्यों...?

क्या हमें इन सवालों के जवाब कभी मिल पाएंगे दोस्तों...............!

14 comments:

DEV said...

apke vichar sarahniya hain aur jis sondrya se shabdo ke upyog kiya gaya hai wo prashansha ke layak hain...ab agar aapke vicharo par tippani ki baat ki jaye to yahan ye samajh pana kathin hai ki kyun ek dharm ke prati aapki safayi di gayi hai...aur agar ek dharm ke paksh mein kuch kaha bhi gaya hai to atankwad,gohatya jaise muddo ko uthakar apna paksh rakhne ka doosra pahlu ye bhi najar aata hai ki khain na kahin aapki wyaktigat soch in do muddo se ek dharm ko jodkar dekhti hai jabki ho sakta hai awam ki soch ye na ho...
waise yahan sachchayi ye bhi hai ki atankawad aur gohatya jaise muddo mein bharat desh mein sabse jyada koi jimmedar paya gaya hai to wo islam dharm ke log hai par isse ye katayi sabit nahi hota ki sabhi islami aaropi hain...insan se dharm nahi jana jata..dharm se insaan jane jate hain...hindu ya isayi agar kuch galat kare to poore dharm ko jimmedar nahi mana ja sakta...jarurat is baat ki nahi janab ki pne dharm ke bachaw mein kuch kaha jaye,karurat is baat hai ki sabhi apne dharm ke logo ko insaniyat ka path padhayein aur achche karm karne ki iksha dein fir ye bahas swatah hi samapan ki aor chal niklegi...
dhanyawad
Devrishi Malik

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ब्लाग जगत में आप का स्वागत है। आप ने अच्छा लिखा है।
लेकिन आप ने बहुत से विषय एक साथ उठा दिए। जैसे आप को फिर कहने का अवसर ही नहीं मिलेगा। आलेख में पैरा हैं ही नहीं। बीच में पढ़ने वाले की निगाह चूक जाए तो ढूंढता ही रह जाए। देव साहिब ने सही फरमाया है उन की टिप्पणी पर ध्यान दें।
वर्ड वेरीफिकेशन हटाएं टिप्पणी कर्ता को परेशानी होती है।

irdgird said...

गुफरान भाई,
आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है। आपका विचार पढ़े लेकिन मेरी गुजारिश है कि अपनी सोच को थोड़ा विस्‍तृत रखिए। किसी को ऐसा न लगे कि आप किसी पर व्‍यक्तिगत हमला कर रहे हैं।
देव साहब और दिनेशराय जी की टिप्‍पढ़ीं पर भी ध्‍यान दीजिए।
ये सही है‍ कि कोई धर्म आतंकवाद और परपीड़न की इजाजत नहीं देता। हिंसा किसी धर्म का गहना नहीं है, इसलिए आतंकवाद को इस्‍लाम से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन ये भी सही है कि आतंकवाद की नर्सरी उन्‍हीं मुल्‍कों में आज सबसे ज्‍यादा फल-फूल रही है जहां इस्‍लाम धर्म के अनुयायी हैं। हिंसा की मुक्‍त कंठ से भर्त्‍सना की जानी चाहिए, चाहे वह किसी भी रूप में हो। जेहाद के नाम पर भी।
कंधमाल में जो भी हुआ वह मानवता के नाम पर कलंक है, उसे किसी भी हालत में प्रतिक्रिया कहकर इग्‍नोर नहीं किया जा सकता। गुजरात हो या देश का कोई भी हिस्‍सा लेकिन धार्मिक उन्‍माद के नाम पर वोटों की राजनीति को सिर्फ हम और आप ही मिलकर नकार सकते हैं लेकिन जब नकारने का समय आता है तो हम धर्म और जातियों में बंट जाते हैं। कबीलाई हो जाते हैं।
आपका ये क‍हना भी गलत है कि देश में चमड़े का कारोबार ही बंद कर दीजिए तो गोहत्‍या बंद हो जाएगी। चमड़ा सिर्फ गाय का ही तो नहीं होता।...एक बात और समझ लीजिए कि व्‍यापारी का कोई धर्म नहीं होता चाहे वह खाल के व्‍यापारी हों या राजनीति के।

फ़िरदौस ख़ान said...

गो-हत्या के मुद्दे पर यही कहूँगा कि चमड़े के कारोबार पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये तो गो-हत्या अपने आप बंद हो जायेगी अब सवाल ये उठता है कि देश में चमड़े के बड़े कारोबारी किस धर्म से हैं किसी से ढाका छुपा नहीं है लेकिन उनके खिलाफ बोलने कि हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है क्यों...?

सही सवाल उठाया है आपने...

कानपुर में एक विशेष संगठन के दो लोग बम बनाते मारे जाते हैं...इसी तरह नांदेड़ में 'एक संगठन' के लोगों के पास से पास से मस्जिदों के नक़्शे, नक़ली दाढ़ी-मूंछे और मुस्लिमों द्वारा पहनी जाने वाली टोपियां मिलती हैं...अच्छा हुआ ये घटनाएं सामने आ गईं... इससे यह साबित हो गया कि कुछ लोग मुसलमानों को आतंकवादी साबित करने के लिए ख़ुद आतंकवाद फैला रहे हैं...महाराष्ट्र के एक नेता ने तो खुलेआम ऐलान करते हुए हिंदू आत्मघाती दस्ते बनाने की सलाह दी थी...उसके एक हफ़्ते बाद ही सूरत में बम मिलने लगे...जो लोग नक़ली दाढ़ी-मूंछे और मुस्लिमों द्वारा पहनी जाने वाली टोपियां का इस्तेमाल कर सकते हैं...क्या वो इस्लामी नाम का इस्तेमाल करते हुए इंडियन मुजाहिदीन नाम का कोई संगठन नहीं बना सकते...?

हमारे देश की पुलिस भी ख़ूब है...सीबीआई के साथ मिलकर भी आरुषी के क़ातिल को आज तक पकड़ नहीं पाई...लेकिन आतंकवादियों को पकड़ने में सबसे आगे रहती है...हो भी क्यों न...? यही काम तो सबसे आसान है किसी भी मुसलमान को पकड़ कर मीडिया के सामने आतंकवादी घोषित कर दो...कोई यह जाने कि कोशिश क्यों नहीं करता कि इंडियन मुजाहिदीन का असली मास्टर माइंड कौन है...

दरअसल दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ना एक सोची-समझी सांजिश है जिसकी शुरुआत पश्चिमी देशों ने की थी। आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए, भले ही वो कोई इंसान करे, संगठन करे या फिर कोई सरकार करे, लेकिन इसे मजहब से जोड़े जाने को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। गौरतलब है कि 'इस्लाम' शब्द अरबी भाषा के 'सलाम' शब्द से निकला है, जिसका मतलब है सलामती, अमन। ऐसी हालत में आखिर किस बिनाह पर कहा जा सकता है कि इस्लाम दहशतगर्दों को पनाह देता है।

क़ुरान में कहा गया है कि ''वह (अल्लाह) ऐसा माबूद है कि उसके अलावा कोई दूसरा माबूद नहीं है, वह शहंशाह है, पाक है, सलामती और अमन देने वाला निगरां है।'' (क़ुरान: 59:23)

क़ाबिले-गौर यह भी है कि मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि जब किसी पैगम्बर का नाम सुनो तो उसके साथ 'अलैहिस्सलाम' कहो। इसका मतलब है उन (पैगम्बर) पर सलामती और अमन हो। जब मुसलमान आपस में मिलते हैं तो एक-दूसरे को सलाम करते हैं, जिसका मतलब भी अमन और सलामती ही है।

जन्नत में भी लोगों को सलामती के ही शब्दों से पुकारा जाएगा। इस बारे में कहा गया है कि ''और उनका परस्पर सलाम यह होगा कि अमन और सलामती हो तुम पर।'' (क़ुरान:10:10)

जन्नत की तारीफ में कहा गया है कि ''वहां हर तरफ से अमनो-सलामती ही अमनो-सलामती की आवाज आएगी।'' (क़ुरान 56:26)

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल0 को संबोधित करते हुए कहा गया है कि ''ऐ मुहम्मद! हमने तुम्हें दुनिया के लिए दयालुता ही बनाकर भेजा है।'' (क़ुरान 21:07)

क़ुरान में जगह-जगह लोगों को सब्र करने और माफ़ करने की ताकीद की गई है। क़ुरान में 85 जगह अल्लाह को माफ़ करने वाला कहा गया है। अल्लाह ने अपने नबी से कहा है कि ''ऐ पैगम्बर! ईमान वालों से कह दो कि वे उनको भी माफ कर दिया करें जो अल्लाह के कर्म परिणामों की उम्मीद नहीं रखते, ताकि लोगों को उनकी करतूतों का बदला मिले। जो कोई अच्छा काम करता है तो अपने लिए ही करेगा और जो कोई बुरा काम करता है तो उसका बवाल उसी पर होगा। फिर तुम अपने रब की तरफ लौटाए जाओगे।'' (क़ुरान 45 : 14-15)

''बुराई को भलाई से दूर करो'' (क़ुरान 28 :54)

''और जो शख्स सब्र से काम ले और दूसरे के कसूर को माफ कर दे तो बेशक यह बड़ी हिम्मत का काम है।'' (क़ुरान 42 :43)

''बेशक अल्लाह तुम्हें इंसाफ़ और नेक काम करने का हुक्म देता है।'' (क़ुरान 16 :90)

''तुम में जो श्रेष्ठ और सामर्थ्यवान हैं, वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह के रास्ते में घरबार छोड़ने वालों को कुछ न देने की कसम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि माफ़ कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला और रहम करने वाले है।'' (क़ुरान 24 :22)

''भलाई और बुराई बराबर नहीं है। अगर कोई बुराई करे तो उसका जवाब भलाई से दो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारा दुश्मन ही तुम्हारा गहरा दोस्त बन गया है। और यह गुण उन्हीं को मिलता है जो सब्र करने वाले हैं और जो बेहद खुशनसीबहैं। अगर इस बाबत शैतान के उकसाने से तुम्हारे अंदर कोई उकसाहट पैदा हो जाए तो अल्लाह की पनाह तलाश करो। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है।'' (क़ुरान 41 : 34-36)

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल0 ने अपनी बेटी के क़ातिल को माफ़ करते हुए बस यही कहा था कि मेरी नज़रों के सामने से हट जाओ...यही है मेरा इस्लाम...

neeshoo said...

गुरफान भाई । पहले तो आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस संदेश के लिए के लिए । मैने इस पोस्ट को इसके टाइटल को देख ही पढ़ा । आपने जो तर्क दिये मैं समर्थन करता हूँ उनका । भारत में जो हिंसा जाति केनाम पर है वह तो तुछ राजनीति का परिणाम है। आतंक सा सही सही उदाहरण दया आपने । तहे दिल से शुक्रिया ।

amit chaturvedi said...

bhai ek bar fir se vah vah aapke blog ke liye
mera manna ye ki is jamiee per sirf ek jati hai jo sabse nek aur raham dil hai aur vo hai insan baki sabhi jo haivaniyat ka naach karte hain ya karwate hain vo ya to raksakh hai ya janvar hain

aap unhen hindu ya muslman ya isaai na kahen kyun ki isse hum sabhi badnam hote hain

meedia ko bhi chahiye ki aisi kisi havaniyat wali khabar ko jaati vishesh se jod kar na chhpe blaki janvaron ki kartoot kahen aur prashan ko bhi chahiye ki inko vahi sazza de jo ek pagal aur hinsak janwar ko di jati hain

ek bar fir se aapko aapki is acchi koshish ke liye badhai

vivek said...

प्रिय गुफरान भाई आपके लेख को पड़ कर ऐसा महसूस हो रहा है की वास्तव में आज की राजनीती अमन चैन के बिलकुल विपरीत है.अच्छे लेख के लिए आपको धन्यवाद्.

नटखट बच्चा said...

फिरदौस उर्फ़ मौसम जो एक ही आदमी है ओर जिनके ब्लॉग से अक्सर इस देश के लिए नफरत नजर आती है कायदे से उनके ब्लॉग पर बैन लगना चाहिए .
खास तौर से नजर डाले

जिया उर रहमान
उम्र -२४ साल
जामिया मिलिया का तीसरे साल में पढने वाला छात्र

मुझे अपने किए पर कोई पछतावा नही ,अगर पकड़ा नही जाता तो नेहरू-प्लेस पर बोम्ब रखता ,कुछ ही लोगो का अल्लाह का ये फर्ज निभाने का मौका मिलता है ,मै इस्लाम की सेवा कर रहा हूँ .
जब उसे पोच्चा गया क्यों ऐसा कर रहे हो ?
गुजरात में जो हुआ उसके ख़िलाफ़ !
तो दिल्ली में मासूमो का मारकर कैसा बदला ?
जवाब में में गुस्सा "मार दो गोली मुझे "

साकिब निसार -उम्र २३ साल
जामिया मिलिया का graduates ,फिलहाल M.B.A की तैय्यारी सिक्किम की मनिपाल यूनीवर्सिटी से से
कहते है जिहाद के लिए बम रखा
शकील -उम्र २६ साल
जामिया मिलिया के आखिरी साल के इकोनोमिक्स के छात्र
कोई पछतावा नही ,हम अल्लाह के लिए कर रहे है ओर इस देश की इकोनोमी बरबाद कर देगे .

ये सब पढने के लिए इंडिया टुडे ओक्टोबर अंक पेज नंबर ३२-३९ पढिये तो जो लोग बड़े बड़े दावे पेश कर रहे थे इन मासूमो के बचाव में ,उनकी आँखे खुल जानी चाहिए ,अब या तो इंडिया टुडे झूठी है या सारे सबूत मन घड़ंत जैसा की सब कहते है .
जामिया मिलिया का अगर कोई छात्र ख़राब है तो इसमे जामिया को क्यों शर्म आती है ,हर यूनी-वर्सिटी में किस्म किस्म के शोहदे होते है ,इसमे यूनी-वर्सिटी की कोई गलती नही ,उम्मीद है अब वहां के वाइस चांसलर भी खामोश बैठेगे .

shahbaz said...

Gufran Sahab,bahut badhiya roishni dalee hai apne aaj-kal ke halat par, Apke sare points se main ittefak rakhta hun, apke ke sare fact bahut he kabile-tareef aur present time kee hakeekat hain, Main ummeed karta hun kee aap apni painee nazar aur pen ko isee tarah chalate rahenge,

gufran ahmad said...

आपके लेख को पड़ कर ऐसा महसूस हो रहा है की वास्तव में आज की राजनीती अमन चैन के बिलकुल विपआपके लेख को पड़ कर ऐसा महसूस हो रहा है की वास्तव में आज की राजनीती अमन चैन के बिलकुल विपरीत है.अच्छे लेख के लिए आपको रीत है.अच्छे लेख के लिए आपको

Farasat Khan said...

Dear Ghufran,

A very good write up by you. But, who doesn't agree with this. I am proud to be an Indian Citizen where people have the sense to think beyond what's looking. I meet good number of people from all the religions and I find nobody who blames the entire community for any such incidence. It's totally upto us whom we pay attention. Those who have some mouth piece and they spread hatred or the general people who believe in peace.

As far as closure of leather business is concerned, I feel sorry to say that I don't agree with this. I believe that to honor the feelings of our Hindu Brothers, all Muslims, Christians or whosoever eats beef should quit eating beef. I am confident that no body will starve. Allah has created good chunk of delicious vegetables, fruits, grains, fish, egg and dairy products.

I believe that you would keep posting good write ups like this. May Allah give you all the success in your life and beyond.

Thanks,

Farasat Khan

saleem akhter siddiqui said...

aapne jo likha hai. shi likha hai. lekin kuch bhi likhte waqt yeh dhyan rahe ki kisi ki bhawna ko thes na pahunche. likhte rahiye.

डा. फीरोज़ अहमद said...

अच्छे लेख के लिए आपको धन्यवाद्.
http://rahimasoomraza.blogspot.com
http://vangmaypatrika.blogspot.com

Mohammed Umar Kairanvi said...

जिहाद, आतंकवाद आदि बातों का जवाब एक पोस्‍ट में नही दिया जा सकता, इसी लिए हमने कोशिश की है कभी फुर्सत में देखिये इस विषय पर आपका ज्ञान ना बढा तो कहना

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