Monday, February 22, 2010

अनंत अंत

अनंत अंत को तलाश करते हुए एक ऐसे पथ पर चल रहा हूँ जहाँ दूर दूर तक फैला अन्धकार है मुझे लगा ये मेरा वहम है लेकिन इस अंधकार से बाहर निकलने का कोई रास्ता मुझे नहीं मिल रहा है बहुत तलाश करने पर भी वो रौशनी की किरण नहीं दिखती जिसके लिए मै यहाँ आया.....

अनंत अंत

इस अर्थ हीन जीवन में
अनंत अंत के चक्कर में
भटकता सा चंचल मन मेरा है ,
कभी सोचता हूँ इस सृष्टि को
मेरे लिए रचा गया है , कभी
इनसे भागता सा मन मेरा है,
स्वयं को धिक्कारती सी आत्मा
सब कुछ पाने को बेताब शरीर दिखे है ,
अपनों के पापों से दूषित देखो
गंगा का निर्मल जल भी दिखे है,
सूरज की किरने भी अब तो
अपनों के लहू सी लाल दिखें हैं,
इस जीवन दाई हवा से पूछो
उसमे घुलता सा ज़हर ये किसका है,
अनंत अंत के चक्कर में
भटकता सा चंचल मन मेरा है,

5 comments:

Shishir Shukla said...

काफी अच्छा लिखते है आप । मुझे तो पता ही नही था।

शहरोज़ said...

आप सभी को ईद-मिलादुन-नबी और होली की ढेरों शुभ-कामनाएं!!
इस मौके पर होरी खेलूं कहकर बिस्मिल्लाह ज़रूर पढ़ें.

naved said...

kya aap vastaw main satye ko talash kar rehe hai. Ya ye sirf kavita kahne ke liye shabdo ko piroya gaya hai.
Apne mann se puchiye ..........
waise acha likha appne.

naved said...

kya aap vastav main satya ki talash main hai. ya ye sirf kavita ke liye shabdo ko piroya gaya.

Satye ki talash karo. Or sabse bada satye ye hai ki Ham sab ka palanhar ek hai.
uske siwa kisi ki bandagi na karo.

Apne man ko tatolo ..



waise acha likha hai appne

surendrshuklabhramar5 said...

गुफरान भाई बहुत सुन्दर रचना ..आप के शब्द साहित्य के खुशनुमा हैं ...शुभकामनाएं ..सद्भाव बना रहना चाहिए ..मानव और मानवता का ध्यान रखना हमारा फर्ज है . .... ..आप का स्वागत है आइये बाल झरोखा सत्यम की दुनिया व् अन्य पर भी
शुक्ल भ्रमर ५